Saturday, April 8, 2017

गुरु अमरदास के रुमाल का कमाल +रमेशराज




गुरु अमरदास के रुमाल का कमाल

+रमेशराज
-----------------------------------------------------------------
केवल डेढ़ वर्ष तक गुरुपद को सम्हालने वाले गुरु अमरदास गोईंदवाल नगर और 84 सीढि़यों वाली पवित्र बावली के निर्माणकर्ता तो रहे ही हैं, गुरुजी ने गुरु रामदास को नया नगर अमृतसर बसाने की भी प्रेरणा दी।
गुरु अमरदास अत्यंत धार्मिक अभिरुचि थे। परमात्मा की हर शक्ति उनके भीतर विराजमान थी। उन्होंने अपने अनन्य भक्त भाई पारो, लालो, दीया, मल्लू, थाही आदि का उपदेशों के द्वारा उद्धार किया। गुरुजी ने भक्ति को स्पष्ट करते हुए उसके तीन प्रकार बतलाये। उन प्रकारों को स्पष्ट करते हुए गुरुजी ने कहा कि नवधा भक्तिके अन्तर्गत भक्त सतनाम का सुमिरन परमात्मा के चरणों में लीन होकर दास्य भाव से करता है। प्रेमा भक्तिमें भक्त रात-दिन परमात्मा से प्रेम करते हुए मस्त रहता है। परा-भक्तिके अन्तर्गत भक्त का चित्त आनंद स्वरूप हो जाता है जो कि समस्त जगत के कल्याण का एक रूप है।
 गुरुजी ने जगत के कल्याणार्थ अपने भतीजे सावनमल को एक पवित्र रूमाल देते हुए कहा-‘‘इस रुमाल को सदैव हाथ में धारण रखना, दूसरे गुरुपद के मनोवांछित कार्य सम्पन्न होंगे। साथ ही तुम्हारी हर पवित्र कामना को यह रुमाल  पूरी करेगा।’’
एक समय की बात है जब एकादशी व्रत का दिन था। गुरुजी के भतीजे सावनमल हरिपुर में थे। इस दिन हरिपुर के राजा की आज्ञा थी कि कोई भी अन्न ग्रहण नहीं करेगा। किंतु सावनमल ने एकादशी के दिन भी रेाज की तरह स्वयं खाना बनाकर खुद खाया और अन्य भक्तों को भी खिलाया। यही नहीं इस प्रसाद को बहुत से हरिपुरवासी भी ले गये।
    राजा को जब इसका पता चला तो वह क्रोधित हो गया। उसने सावनमल को तुरंत अपने दरबार में बुलवा लिया और पूछा-‘‘एकादशी व्रत के दिन जबकि कोई अन्न ग्रहण नहीं करता है, तुमने खाना बनाकर स्वयं क्यों खाया और अन्य लोगों को क्यों खिलाया? यहां तक कि हमारी प्रजा में अन्न से बनी रोटियों को प्रसाद के रूप में बांटकर तुमने जो अपराध किया है, उसे देखते हुए हम तुम्हें प्राणदण्ड तो नहीं, किन्तु कैद करने का हुक्म देते हैं।’’
सावनमल ने कहा-‘‘ राजन्! रोज की तरह यह कार्य इसलिये किया गया क्योंकि हमारा गुरुपरिवार इस तरह के व्रतों में विश्वास नहीं रखता।’’
यह सुनकर राजा आगबबूला हो गया और उसने अपने मंत्री  से कहा-‘‘इसने हमारी आज्ञा का उल्लंघन किया है अतः इसे कैद कर लिया जाये।’’ मंत्री ने सावनमल को कैद खाने में डलवा दिया।
 इस घटना के दूसरे दिन राजा के लड़के को हैजा होने के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। महल में शोक छा गया और राजा-रानी सहित प्रजाजन विलाप करने लगे।
    तभी राजदरबार के पुरोहित और ब्राह्मणों ने राजा से कहा-‘‘ महाराज! आपने निर्दोष सिखों को कारागार में  डाल दिया है, इसी कारण आपको पुत्र-वियोग सहना पड़ रहा है।
यह सुनते ही राजा ने समस्त सिखों को सावनमल के साथ कारा से मुक्त कर दिया। कारा से मुक्त होने के बाद सावनमल ने राजा को संदेश भिजवाया कि वह उसके पुत्र को जीवित कर सकते हैं। राजा ने तुरंत ही सावनमल को महल में बुलवा लिया। सावनमल ने राजा के पुत्र की मृतकाया के समीप जपुजी साहबका पाठ किया और गुरु अमरदास से प्रदत्त रूमाल के कोने को धोकर उसकी दो तीन बूंदें लड़के के कान में डाल दीं। ऐसा होते ही राजा का पुत्र जीवित हो उठकर बैठ गया। ये चमत्कार देख राजा- रानी सावनमल और उनके गुरु के प्रति श्रद्धानत हो उठे। उन्होंने सावनमल को ढेर सारा धन व वस्त्र दिये और सतनाम का जाप करने लगे।
-----------------------------------------------------------
संपर्क-15/109 ईसा नगर निकट थाना सासनी गेट अलीगढ़

मोबा.-9359988013

खालसा-सैन्य-गठन हुआ था बैसाखी के दिन +रमेशराज




खालसा-सैन्य-गठन हुआ था बैसाखी के दिन

+रमेशराज
-----------------------------------------------------------------
    जिस बैसाखी पर्व को सिख लोग नाचते-गाते, तलवारबाजी का कौशल दिखाते, ढोल बजाते बड़ी धूमधाम और उत्साह के साथ मनाते हैं, इसी बैसाखी के दिन बालपन से ही युद्ध में निपुण, गुरु परम्परा का अन्त करके श्री गुरुग्रन्थ साहिबको ही मानने का संदेश देने वाले एवं वीरतापूर्वक अत्याचारियों से लोहा लेने के लिए धर्म को दुष्टों का विनाश करने का एक मात्र साधन बताने वाले सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह ने ‘खालसा पंथ’ की स्थापना की। वैसाखी मेले के अवसर पर गुरुजी ने सारी सिख संगतों को मेले में एकत्रित होने का आदेश दिया। मेले में एक बड़ा पंडाल बनाकर दरवार लगाया गया। आनंदपुर में आयोजित इस उत्सव में गुरुजी का उपदेश सुनने हजारों संगतें उपस्थित हुई।
    सिख संगतों से खचाखच भरे पंडाल के दरबार में सब लोग जब टकटकी लगाये गुरु गोविन्द सिंह को देख रहे थे, तभी गुरूजी ने अपने हाथ में नंगी तलवार लेकर ऊँची आवाज में कहा- ‘‘है कोई ऐसा सिख जो हमें अपना शीश भेंट कर सके।
यह सुनकर सभा में एकत्रित समस्त जन समूह में सन्नाटा छा गया। गुरुजी ने गर्जना-भरे स्वर में इसी वाक्य को तीन बार दुहराया। वाक्य के अन्तिम बार दुहराने के बाद लाहौर के भाई दयाराम उठ खड़े हुये और उन्होंने बड़े ही दृढ़ स्वर में कहा-‘‘गुरूजी आपकी सेवा में मेरा शीश हाजिर है, कृपया भेंट स्वीकार करें।’’
यह सुनकर गुरुजी दयाराम को दरबार के एक कोने बने तम्बू में ले गये और कुछ देर बाद खून से सनी तलवार लेकर दरबार में आ गये। उन्होंने फिर एक और सिख का शीश भेंट करने की माँग दुहरायी। इस बार दिल्ली के धर्मदास ने अपना शीश देने के बात कही। गुरुजी धर्मदास को भी तम्बू में ले गये और पुनः रक्त भीगी तलवार लेकर दरबार में उपस्थित हुये। उन्होंने फिर यही वाक्य दोहराया कि ‘‘अब कौन अपना शीश भेंट करने को तैयार है।’’
    गुरुजी की बात सुनकर इस बार समस्त सिख संगतों में भय व्याप्त हो गया और दरबार से लोगों ने एक-एक कर खिसकना शुरू कर दिया। तभी द्वारका के मोहकम चन्द ने उठकर कहा- गुरूजी मेरा शीश आपके चरणों में अर्पित है।’’
गुरुजी मोहकम चन्द को भी तम्बू में ले गये और कुछ देर बाद रक्त से सनी तलवार को लेकर दरबार में हाजिर होकर बोले-‘‘और कौन अपना शीश दे सकता है।“
चौथी बार जगन्नाथपुरी के साहब सिंह और पांचवी बार हिम्मत सिंह ने गुरुजी को अपने शीश भेंट किये। तदोपरांत गुरूजी दरबार में आये और तलवार म्यान में रखकर सिंहासन पर बैठ गये। तम्बू में जिन पाँच सिखों को शीश भेंट कराने के लिए ले जाया गया था, वे जब नयी पोशाक पहनकर तम्बू से बाहर निकलकर दरबार में उपस्थित हुये तो दरबार में बैठे लोगों के आश्चर्य की कोई सीमा न रही।
    गुरुजी ने पांचों सिखों को अपने पास बिठाया और सिख संगत के बीच घोषणा की कि जिन पाँच जाँबाज सिखों ने आज शीश भेंट किये हैं आज से ये पाँचों मेरे ही स्वरूप हैं। ये आज से पंच प्यारेकहलायेंगे। जिस स्थान पर यह समारोह हुआ उस स्थान का नाम केसरगढ़ रख दिया गया।
    गुरुजी ने चरण पाहुलको खण्डे के अमृतनाम देकर पंच प्यारोंके साथ-साथ अनेक सिखों को अमृतपान कराकर उनके नाम के पीछे सिंहजोड़ने को आदेश दिया और स्वयं अपना नाम भी गुरु गोविन्द राय के स्थान पर गुरू गोविन्द सिंह रखा और गुरूजी ने कहा कि अमृतपान करके ही सिख बना जा सकता है। तभी से कोई पांच सिख जो मर्यादा के पक्के हों, ‘गुरू ग्रन्थ साहिबके सम्मुख अमृत तैयार करते हैं।
    बैसाखी का त्योहार खालसा के स्थापना दिवस पर पूरे सिख समुदाय में बड़ी धूमधाम से मनाने का प्रचलन तभी से है। इस अवसर पर खालसा पंथ में आस्था व्यक्त की जाती है।
-------------------------------------------------------------
15/109, ईसा नगर, अलीगढ़
मो.-9359988013